हूँ इस भरी भीड़ में,
फिर भी हूँ एकदम अकेली ।
ये नई दुनिया लगे मुझे एक नई सी पहेली ।।
अंजान हूँ खुद से ,
एक पहचान है बनाना ।
थोड़ा मुश्किल है यह नया सच अपनाना ।।
बढ़ना चाहती हूँ आगे ,
पर गिर जाती हूँ ।
फिर उठती हूँ ,चलती हूँ और चलते जाती हूँ।।
मंजिल का पता नही,
ना है कोई ठिकाना ।
अब तो खुद ही है संभालना और चलते जाना।।
ये है मुखौटों की दुनिया,
मुखौटों से लोग ।
ना कोई अपना, ना कोई बेगाना।।
खुद में झांको ,
खुद को जानो।
इस भरी भीड़ में खुद को पहचानो।।
जिस दिन बूझी तुमने ये पहेली ,
फिर ये पहेली भी बन जाएगी तुम्हारी "सहेली" !!
द्वारा : प्रिया त्रिपाठी
फिर भी हूँ एकदम अकेली ।
ये नई दुनिया लगे मुझे एक नई सी पहेली ।।
अंजान हूँ खुद से ,
एक पहचान है बनाना ।
थोड़ा मुश्किल है यह नया सच अपनाना ।।
बढ़ना चाहती हूँ आगे ,
पर गिर जाती हूँ ।
फिर उठती हूँ ,चलती हूँ और चलते जाती हूँ।।
मंजिल का पता नही,
ना है कोई ठिकाना ।
अब तो खुद ही है संभालना और चलते जाना।।
ये है मुखौटों की दुनिया,
मुखौटों से लोग ।
ना कोई अपना, ना कोई बेगाना।।
खुद में झांको ,
खुद को जानो।
इस भरी भीड़ में खुद को पहचानो।।
जिस दिन बूझी तुमने ये पहेली ,
फिर ये पहेली भी बन जाएगी तुम्हारी "सहेली" !!
द्वारा : प्रिया त्रिपाठी