Monday, 10 April 2017

पहेली -सहेली

हूँ इस भरी भीड़ में,
फिर भी हूँ एकदम अकेली ।
ये नई दुनिया लगे मुझे एक नई सी पहेली ।।

अंजान हूँ खुद से ,
एक पहचान है बनाना ।
थोड़ा मुश्किल है यह नया सच अपनाना ।।

बढ़ना चाहती हूँ आगे ,
पर गिर जाती हूँ ।
फिर उठती हूँ ,चलती हूँ और चलते जाती हूँ।।

मंजिल का पता नही,
ना है कोई  ठिकाना ।
अब तो खुद ही है संभालना और चलते जाना।।

ये है मुखौटों की दुनिया,
मुखौटों से लोग ।
ना कोई अपना, ना कोई बेगाना।।

खुद में झांको ,
खुद को जानो।
इस भरी भीड़ में खुद को पहचानो।।

जिस दिन बूझी तुमने ये पहेली ,
फिर ये पहेली भी बन जाएगी तुम्हारी "सहेली" !!
                                  द्वारा : प्रिया त्रिपाठी