Monday, 10 April 2017

पहेली -सहेली

हूँ इस भरी भीड़ में,
फिर भी हूँ एकदम अकेली ।
ये नई दुनिया लगे मुझे एक नई सी पहेली ।।

अंजान हूँ खुद से ,
एक पहचान है बनाना ।
थोड़ा मुश्किल है यह नया सच अपनाना ।।

बढ़ना चाहती हूँ आगे ,
पर गिर जाती हूँ ।
फिर उठती हूँ ,चलती हूँ और चलते जाती हूँ।।

मंजिल का पता नही,
ना है कोई  ठिकाना ।
अब तो खुद ही है संभालना और चलते जाना।।

ये है मुखौटों की दुनिया,
मुखौटों से लोग ।
ना कोई अपना, ना कोई बेगाना।।

खुद में झांको ,
खुद को जानो।
इस भरी भीड़ में खुद को पहचानो।।

जिस दिन बूझी तुमने ये पहेली ,
फिर ये पहेली भी बन जाएगी तुम्हारी "सहेली" !!
                                  द्वारा : प्रिया त्रिपाठी 

Friday, 3 March 2017

My Subject

                      My Subject




I wanted to write, 
but, I don't know what?
I kept little quiet and thought a lot.

"What should i write for?", was going in my mind.
What words to put and what subject shall i find?

Something related to science Or may be nature,
or shall i just choose any creature?

I wanted my content to be short and simple
without making it abstruse and quite an ample.

while, thinking about all this,  I didn't realise
and looking at my scribbled paper, I was little surprised.

the war to conquer, was already fought,
my words were bound and my poem was already on plot.

                                                                                   By: Priya Tripathi

Thursday, 9 February 2017

SINGLE SOUL

oh! You Dear single soul,
fathoming your goal ,,

you are flying high,
 to touch the sky.

i know its hard,
but do not fall apart,,

with all your strength and all your dignity ,
one day you will create your own identity.
                                                         

                                                By:Priya Tripathi

Wednesday, 19 October 2016

मैं हूँ एक नन्ही चिड़िया !!

मैं हूँ एक नन्ही चिड़िया
मुझे आस है जीने की..
हर दर्द को पीने की  ...
कोई काट ना देना पंख मेरे  ..मुझे उड़ना है कुछ दूर...
ना रह पाऊँगी बंधन में  ..मत कर मुझको इतना मज़बूर .. !!
क्यों कैद करे मुझे पिंजरे में घुट घुट के सांसें लेती हूँ.
हर वक़्त बना रहता है डर..ना जीती हूँ ,ना मरती हूँ।।

देखे है मैंने भी कुछ सपने इन छोटी छोटी आँखों में..
हर हाल में है पूरा करना ये तलब है सीने की ..
मैं हूँ एक नन्ही चिड़िया मुझे आस है जीने की  . .. ।।
कर ले कर सकता है जितने भी सितम ..
हर मुश्किल से मैं लड़ जाउंगी...
एक दिन देखता रह जायेगा तू  और मैं तेरा पिंजरा लेकर उड़ जाउंगी..।।

दिखती हूँ छोटी नाज़ुक सी ...पर मुझमे  हिम्मत है हर एक ज़हर को पीने की ..
मैं हूँ एक नन्ही चिड़िया ,मुझे आस है जीने की ...!! 😊
                                                 
                                                द्वारा- प्रिया त्रिपाठी 

Saturday, 2 April 2016

ज़िन्दगी मौत ना बन जाये .. संभालो यारो.......

ईश्वर द्वारा दिया गया बहुमूल्य उपहार है "ज़िन्दगी" ,पर इसे जीने वाले लोग अक्सर इसकी डोर अपने ही हाथो तोड़ दिया करते है। ...

हाल ही में ऐसा कुछ किया टी.व्ही. जगत की मशहूर अभिनेत्री pratyusha banerjee ने ।
"आनंदी" के नाम से चर्चित हुई इस युवा अभिनेत्री ने 17 साल की कम उम्र में हर घर में अपनी एक अलग पहचान बनायीं । परंतु महज 24 साल की उम्र में आत्महत्या करने जैसा घातक कदम उठा लेने की खबर प्रत्युषा से जुड़े हर एक व्यक्ति के लिए अप्रत्याशित सच था । कोई सोच सोच भी नहीं सकता था की इतनी जिंदादिल और चुलबुली लड़की ऐसा गंभीर कदम उठा लेगी।

अकसर इंसान हंसी का झूठ मुखौटा पहने ,अपने अंदर पलने वाले सभी चिंताओं एवं कष्टो को छुपता है । इस भीड़-भाड़ वाली high profile दुनिया में सब खुश हाल एवं समृद्ध जीवन चाहते है ,जिसे पाने के लिए एक व्यक्ति हर वह संभव कोशिश करता जिससे वह समाज में अपना एक high standard सेट कर सके । परंतु इस अधुनकिता और दिखावे की दौड़ में वह खुद को असलियत में खुद को खुश और आत्मसंतुष्ट रखना भूल जाता है

अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ जीत हासिल करने की होड़ ,व्यक्ति की मानसिक स्तिथि बिगाड़ कर उसे आत्महत्या करने में मजबूर कर सकती है ।
सफलता और असफलता तो जीवन में नाममात्र के दो पहलु है । अतः हमें असफलता को सकारात्मक दृष्टि के देखना चाहिए ।
अतः सफलता को हमेशा सीख का पर्याय मानो और साहस के साथ आगे बढ़ो ।
वर्षो पूर्व राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी ने भी अपनी इन पंक्तियों में मानव जीवन में छुपे अमृत्व को पिरोया है और हमें उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है ।
"नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो"
समझो जिसमे यह व्यर्थ न हो ।।

Thursday, 31 March 2016

स्त्री-इस्त्री

स्त्री तथा इस्त्री शब्द सिर्फ उच्चारण में ही सामान नही  है बल्कि अपने कार्य शैली में भी एक सामान है ..
स्त्री और इस्त्री दोनों अपने  भीतर की ऊर्जा को ताप में बदल कर दूसरो का कार्य आसान बनती है परंतु ताप के  अधिक बढ़ने में यही स्त्री तथा इस्त्री सामने वाले को जला कर राख भी कर सकती है ।
#Don't underestimate the power of a #स्त्री and #इस्त्री 😁😊